शुभकामनाएँहै आपकोआजदिवाली की दीपों से सजीरोशनी से भरीरहे हर शामदिवाली सी नटखट पटाकों सेहँसी के ठहाकों सेभरी हो हर शामदिवाली सी दीयों की आँच सेभस्म हो मन का मैलशुभ हो ये रातदिवाली की शुभकामनाएँहै आपकोरोशनी कीदिवाली की
Category Archives: Hindi poem
Ek Aur Baar
एक शहर पुरानायादों से भरा हुआयादों की डोर खींच लायी हैएक बार और हर लम्हा याद आया हैवो मोड़, वो हँसीफिर वही रास्तेएक बार और कहीं निशान मिट गएकहीं अब भी सजावट हैकिसी ने पुकारा हैएक बार और एक खुश लम्हायहीं रह गया थामिल कर हँसे हैंएक बार और ईंटों की ढेरइमारत बनेगीफिर घर बसेगाएकContinue reading “Ek Aur Baar”
Khamosh tare
रात की चहल पहल मेंतारे ख़ामोश थेकुछ आवाज़ ना हो जाएबादल, चुपचाप चल रहे थेचाँद आधा चमक रहा थाशायद कुछ छुपाए हुए थावो कदम साथ साथ चल रहे थेऔर धड़कन भीकुछ ना कहाफिर भी कहानी कह गएवो गूंजती धड़कनऔर वो ख़ामोश तारे
Badlon ke Pare
बादलों के परे हूँ मैंशायदआसमान हूँ मैं ख़ुशियों की हवाओं मेंहै मेरी उड़ानफिर भी परेशान हूँ मैं अपने आप को ढूँढने निकला हूँअपने आप सेअनजान हूँ मैं फ़िज़ाओं में क़ैद हूँहाँ ख़ुदा नहीं हूँइंसान हूँ मैं
Destination wherever (Manzil Kahan)
सुबह कीख़ामोश रास्तों पररोशनी की किरण हूँ में रात कीसोए हुए अंधेरों कीपहली सुबह हूँ मैं ख़्वाबों के अधूरे अल्फ़ाज़ों कीअनकही कहानी हूँ में सफ़र कीअनजान राहों काअकेला राही हूँ मैं मंज़िलों कीपहचान नहीं हैंशायद पहुँच गया हूँ मैं
Khamoshi
मैं ख़ामोश हूँमेरी चीख़ों को आवाज़ों कीज़रूरत नहीं ख़ामोश अल्फ़ाज़ों कोलफ़्ज़ों की बैसाखियों कीज़रूरत नहीं शब्दों में फ़रेब हैखामोशी में नहींबंद लबों कोक़समों कि ज़रूरत नहीं शब्दों में बनावट हैखामोशी में नहींदिल की गहराइयों मेंमन के बदलते मिज़ाज नहीं मैं ख़ामोश हूँमेरी सचाई कोकिसी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं
Wo mod hi nazar nahin aata
एक अंधेरा भी हैजो रोशन बहुत हैएक खामोशी हैजो कहानी कहे जा रही है मेरे साथ मेरा साया थारात हुई तो खो गया है शायदकल सुबह सुबह मिलेंगे उससेअभी अकेले चल पड़ा हूँ साथ साथ अंधेरा भी चल पड़ा हैऔर वो बातूनी खामोशी भीपूछे बिग़ैर अपने अकेले क़ाफ़िले मेंशामिल हो गया है बातों बातों मेंवक्तContinue reading “Wo mod hi nazar nahin aata”
Jana kahan hai
किस ओर जाना हैखुद जनता नहीं ।जिस तरफ़ कारवाँ चलाउस तरफ़ चल पड़ा हूँ मैं।
Ek sham guzri khushi ke saath
एक शाम गुज़रीसाथ ख़ुशी केबहुत हंसेठहाके लगा के लायी एक तोहफ़ाएक मुस्कुराहटएक हँसीख़ुशी अपने आँचल में छिपा के कई बातें कहीकुछ उसकी सुनीकहा सिर्फ़ जो अच्छा लगेबाक़ी सब मन में छिपा के गरम हाथों से छुआदिलों की गहराइयों कोबैठे साथ साथ जोहाथों में उसका हाथ लेके एक नमी सी महसूस कीमुस्कुराहट के पीछेग़म की परछाईंContinue reading “Ek sham guzri khushi ke saath”
Nayi dosti
फिर अजनबी हैंमुलाक़ात कामौक़ा ढूँढेंगेजान पहचान काबहाना ढूँढेंगेवो सहमी नज़र,उस मुस्कराहट काइशारा ढूँढेंगेनयी दोस्ती हैमोहब्बत का नयाफ़साना ढूँढेंगे
