Khamoshi

मैं ख़ामोश हूँमेरी चीख़ों को आवाज़ों कीज़रूरत नहीं ख़ामोश अल्फ़ाज़ों कोलफ़्ज़ों की बैसाखियों कीज़रूरत नहीं शब्दों में फ़रेब हैखामोशी में नहींबंद लबों कोक़समों कि ज़रूरत नहीं शब्दों में बनावट हैखामोशी में नहींदिल की गहराइयों मेंमन के बदलते मिज़ाज नहीं मैं ख़ामोश हूँमेरी सचाई कोकिसी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं

Meri parchai dhoondhta hoon inme

उन ऊँचाइयों से देखा हैज़िंदगी को उड़ते हुएहवाओं का रुख़ जिस तरफ़ थाउसी रुख़ बहते हुए सूरज को ढलते देखा हैडूबते क्षितिज को रंगते हुएजैसा रंग खुद का थाउसी रंग में घुलते हुए पानी को बहते देखा हैठहरे पथरों पर छलाँगे भरते हुएजिस तरफ़ उसका अंत थाउसी समंदर की तरफ़ मदमस्त बहते हुए रोशनी कोContinue reading “Meri parchai dhoondhta hoon inme”

Dhund Hai, Dhoop hai

धुँध हैकी धूप हैसाँझ हैकी रूप हैरूप हैतो ढल जाएगाख़्वाब हैतो फिर आएगामुझे मत उठानामुझे सोने दोमुझे मेरे ख़्वाबों मेंरहने दोधूप मेंधुँध में

Just want to Flow

बहना है पर किधर जाना उधर है ढलान इधर खारे पानी में जाकर मिल जाना है मेरा हशर वही सही पर आज मुझे बहना है कल का सच पता है आज का सच छिपा सही कुछ आज मुझे कहना है शोर एक और बार सुनना है बस आज मुझे बहना है

Aakhon ka Kasur

ये आँखेंसब देखती हैक़सूर क्या इनका हैमन का शीशा हैजो बिखरा हुआ है कौन सी बातें हैंजो कहें हमजो अछी लगेंशब्दों का ज़ायक़ाकुछ बिगड़ा हुआ है सारा जहां ज़हन में हैक्यूँ फ़िज़ूलजमाने से ख़फ़ा हैंमन का चश्मा हैजो ज़रा पोशिदा है

Social Distancing

शायद मुमकिन नहींफिर भी कोशिश कर लेता हैये दिल, समझता ही नहीं है मर्ज़ ऐसा हैकी दूरी हैदिलों की करीबी कुछ कम तो नहीं दूर होफिर भी तुम्हारा साथ हैये भी कुछ कम तो नहीं है

Melting Boundaries (Pighalte Dayre)

कुछ दायरेकुछ रस्मों रिवाजमेरी हदें तय किया करती हैं मेरा वजूदमेरा मज़हबमेरी पहचान बताया करती हैं मुझे कहाँ जाना हैमुझे क्या करना हैअक्सर ये बयान करती हैं किनारों में रहकर महफ़ूज़ रहा हूँमुक़र्रर मंज़िल की तरफ़ लाचार बहता रहा हूँअपनी पहचान भूल, खारा हो गया हूँ समंदर मेरी मंज़िल नहींमैं कोई दरिया भी नहींमैं तोContinue reading “Melting Boundaries (Pighalte Dayre)”

कुचले हुए घास के पत्ते (trampled grass blades)

घास के पत्तों को कुचले जाने की आदत है मेरी खवाइशों की भी कुछ कुछ ऐसी ही आदत है औस की बूँदों ने हर बार सम्भाला है ख़्वाहिशों की मौत को कई बार टाला है ज़मीन से जुड़ा हूँ मैंने कहाँ जाना है कुचलते कदम गुज़ार जाएँगे मेरा तो यहीं ठिकाना है किसकी जुस्तजू हैContinue reading “कुचले हुए घास के पत्ते (trampled grass blades)”