The duel

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A duel

Between 

This and that

None right 

None wrong 

Just different

One survived

Other slashed

By the sword of choice

Victor 

Can be one

Only one 

But it’s not sure

The winner will be admired 

Or despised

For there are always 

two sets of eyes

That watch the duel

One sees it right

The other finds it wrong

Yet both were right 

After all, it is

Just this and that

Both just the same 

The night spoke

रात की बात 

मुझसे हुई 

खामोश रहे 

कुछ लम्हे दोनों 

फिर लंबी बात हुई 

डर नहीं लगता, क्या तुमको?

उसने पूछा, सहम सहम कर 

मैं ख़ुद हूँ डरा,

और चकित हूँ 

मुझसे मिलने 

क्यों आया कोई 

फ़िर व्यथा 

अपनी सुनाई 

मेरे बारे 

कुछ पूछा नहीं 

कई अरसे का बांध भरा था 

आज अचानक टूटा अभी 

कहने लगा 

अब मेरी सुनो 

धीरे चलता है 

वक्त संग मेरे 

बैठो मेरे पास, 

है समय बहुत 

सूरज जला कर चला गया 

मैं लाया हूँ 

लेप शीत का 

धरती थक कर, 

झुलस गई थी 

अब सोयेंगे 

बेफ़िक्र सभी

मैंने कहा 

आड़ में तुम्हारे, 

रहते हैं दुष्ट निशाचर

भूत पिशाच भी 

सुना छिपे हैं 

घोर अंधेरे में कहीं 

बोला वो 

मुस्कुरा कर 

जिसके कर्म, 

फल उसी को साजे 

करे कोई 

दोष मुझ पर क्यों दागे?

मन का मैल

रोशनी से कहाँ मिटा है 

अमानव, पिशाच 

तो हृदय में छिपा है 

मुझमें मासूम नींद है 

तो मुझमें निर्मम जुर्म भी

जो जैसा ढूँढता है 

अँधेरे में उसको मिलता वही 

मैं शून्य हूँ 

मेरा कुछ भी नहीं 

ना रंग, ना रोशनी है 

अंधेरा हूँ, मुझमें कोई अलग नहीं 

दिन रोशनी है 

सूरज से है वो बलवान  

रात अंधेरा है 

सब कुछ खोने में, उसकी पहचान 

आज आए हो मिलने 

थोड़ी देर सो कर जाना 

अगले दिन की दिनचर्या के नए

बीज बो कर जाना 

सो गया मैं, बेफिक्र 

रात की बात 

शायद ख़त्म हो गई थी 

कहना और भी था शायद 

पर ममता भरी रात

खामोश हो गई थी