Doston ki Mehfil

दोस्तों की महफ़िल हैछलकेंगे पैमानेक़िस्सों का सिलसिला चलेगाबनेंगे कई फ़साने वक्त नया हैनए दोस्त, नए याराने हैंपर जब भी मिलेंगे वो दोस्तगूंजे वही तराने हैं कई साल पुरानी बात हैकई साज़ और ताल मिलाने हैंफिर वहीं से शुरू करेंगेवही रस्ते वही मोड़ पुराने है कुछ तो है जो जोड़े रखता हैरिश्ता तो कोई नहीं हैवक़्तContinue reading “Doston ki Mehfil”

Aakhon ka Kasur

ये आँखेंसब देखती हैक़सूर क्या इनका हैमन का शीशा हैजो बिखरा हुआ है कौन सी बातें हैंजो कहें हमजो अछी लगेंशब्दों का ज़ायक़ाकुछ बिगड़ा हुआ है सारा जहां ज़हन में हैक्यूँ फ़िज़ूलजमाने से ख़फ़ा हैंमन का चश्मा हैजो ज़रा पोशिदा है

Social Distancing

शायद मुमकिन नहींफिर भी कोशिश कर लेता हैये दिल, समझता ही नहीं है मर्ज़ ऐसा हैकी दूरी हैदिलों की करीबी कुछ कम तो नहीं दूर होफिर भी तुम्हारा साथ हैये भी कुछ कम तो नहीं है

Melting Boundaries (Pighalte Dayre)

कुछ दायरेकुछ रस्मों रिवाजमेरी हदें तय किया करती हैं मेरा वजूदमेरा मज़हबमेरी पहचान बताया करती हैं मुझे कहाँ जाना हैमुझे क्या करना हैअक्सर ये बयान करती हैं किनारों में रहकर महफ़ूज़ रहा हूँमुक़र्रर मंज़िल की तरफ़ लाचार बहता रहा हूँअपनी पहचान भूल, खारा हो गया हूँ समंदर मेरी मंज़िल नहींमैं कोई दरिया भी नहींमैं तोContinue reading “Melting Boundaries (Pighalte Dayre)”

Khali haath aaye the, Khali haath jayenge

कौनसा पिटारा लेके जाओगे क्या क्या पसंद आया है कितनी लम्बी उम्र है उसमें कितनी ज़िंदगी है समेटने में उम्र गुज़ारी है इन संदूक़ों का क्या होगा बहुत भारी हो गयी है इस भोझ का क्या होगा दुआओं का पिटारा भरना है खवायिशों का पेट कहाँ भरा है हाथ ख़ाली रहने वाले हैं जहां अगलेContinue reading “Khali haath aaye the, Khali haath jayenge”

Alive

किस बात का गम हैकिस बात की है ख़ुशीक्यूँ आज आँखें नम हैऔर होंठों पे है हँसी किसका इज़हार करते हैंक्या है जो छुपाते हैंकौनसा सच हैंऔर किसको सच समझ जाते हैं ऐसा मातम क्यूँ हैकिसके जनाज़े पर गए हैं सभीसाँस शायद रुख़ गयीं हैपर ज़िंदा हूँ में अभी

Udaan

ऊँचायीयों से डर लगता है गिरने का खौफ है उड़ने का हुनर, सीखा नहीं गिरने का शोक है क्या फ़रक है कौनसा सही एक उभरता है एक ढलता है दोनों सिरों में डोर तो एक है एक पाने में जुटा है एक खोने में खुश है

ग़लत फ़हमी

ड्रॉइंग रूम में सजी मूरतजो किसी कारीगर कीनायाब कारीगरी थीजिसे मजबूर हो करबेचा था उसनेआज वो मेरी है धूल से लथपथअपने गले परअपनी क़ीमत लटकाएजो कभी दुकान के कोने मेंबेज़ुबान पड़ी थीआज वो मेरी है मोल देकर ख़रीदा हैमालिक बदल गया हैना पूछा इस बेज़ुबान सेना ज़रूरत समझीकिसी और की ज़िंदगी का हिस्सा थीआज वोContinue reading “ग़लत फ़हमी”