Shayad

कुछ लिख देता हूं
यूं ही
अपने सच्चे झूठे अल्फ़ाज़
बस यूं ही

तुम्हें पसंद आया
तो लगा
शायद
अच्छा होगा

तुमने माना
तो लगा
शायद
सच्चा होगा

किसको फर्क
किसको परवाह
क्या सच
और किसका सच

पर ये तो सच है
की एक एहसास
जो मेरा था
अब हमारा है

इसी सच पर
यकीन है
इसी भरोसे पर
ये नई मोहिम है

कुछ और लिख रहा हूं
ये सोच कर
तुम्हे पसंद आएगा
बस यूं ही शायद

Phir ek baar

फिर वही दिन
जीना चाहता हूं
फिर वही राहों से
गुजरना चाहता हूं

हर उस पल को
महसूस करना चाहता हूं
जैसा था, जैसा हुआ
बस वैसा ही रखना चाहता हूं

हर खुशी
और गम के लम्हों को
फिर एक बार
चखना चाहता हूं

कुछ छोटे
कुछ लंबे
कदमों के निशान पर
फिर चलना चाहता हूं

कुछ बदलने की ख्वाइश नहीं
कोई शिकवा कोई शिकायत नहीं
बस एक बार और
जीना चाहता हूं