Khwabon ka kaphila

ऐसा कौनसा ख़्वाब है
जो सच्चा ना लगा
ऐसा कौनसा मौक़ा है
जो मुमकिन ना लगा
पर सचाई और ख़्वाब में शायद
नींद खुलने का फ़रक है

नींद खुली और आँखें मलि
आँखों के मैल के साथ
सारे ख़्वाब भी धूल गए
दिन की भाग दौड़ में
वो मौक़ा भी खो गया

हक़ीक़त बनने का हुनर
हर ख़्वाब में था
मौक़े को लपक के
पकड़ने का हुनर
हर बेख़ौफ़ छलाँग में था

पर हर कमजोर मुट्टी ने
मौक़े की फिसलती रेत को
फ़िज़ूल ही गवा डाला है
हर सहमी छलांग ने
मासूम ख़्वाबों को
जन्म से पहले ही मार डाला है

आज फिर नींद खुली है
एक ख़्वाब नया संजोया है
हौसलों की खाद से
और कोशिशों के पानी से
मन की मीठी को
इस बार खूब सींचा है

दूर रोशनी
नज़र आने लगी है
आँखें उस लक्ष्य से
रूबरू होने लगी है
ख़्वाबों का क़ाफ़िला
हक़ीक़त की और चल पड़ा है

आपके ख़याल सुनना चाहूँगा 😊

Just want to Flow

बहना है
पर किधर
जाना उधर है
ढलान इधर
खारे पानी में
जाकर मिल जाना है
मेरा हशर वही सही
पर आज मुझे बहना है
कल का सच पता है
आज का सच छिपा सही
कुछ आज मुझे कहना है
शोर एक और बार सुनना है
बस आज मुझे बहना है

The rights and the wrongs

Pc. WordPress

The right and the wrong
The shackles unseen
the iron bars
and the gaps in between

Together they mark the bounds
Of the solitary prison cell
In such confines
Exists the life we know so well

The cells separate the prisoners
One from the other
Confined in their respective cells
Till the time reaches forever

The bars they say
keep the prisoners safe
to keep them alive
in their own Confined space

The gaps allow
the stretch beyond the rim
Only far enough
till the iron bars tear the skin

It’s not only the bars
That keep you in.
It’s also the gaps
That never lets you win

The rights and the wrongs
Together they bind
To be free
It’s the beyond, that I need to find

It’s not the bars
I need to bend
It’s not the gap
that I need to pretend

It’s me that’s in the trap
It’s the me that needs to melt
When I cease to be in the cell
there are no gaps, no bars to be felt

In the empty cell
There remains only a song
and me resonating on either side
Of what is right and what is wrong

I wonder to myself. And I wonder what you wonder. Look forward to hear what you feel

See you at Pub

She turned as she was leaving.
Holding one hand on the closing door.
Keeping the possibilities open.
She Said, “See you at Pub”
That’s a magical phrase.
As potent as the “Yes We Can”
It is filled with infinite possibilities.
Like the clear water, reflecting the blue sky.
It could mean anything you want.
It could means,
Let’s get out of here.
Let’s meet at a place that’s happy.
Let’s meet at a place that’s ours.
Let’s meet to forget
Let’s meet to remember
There is no plan, let’s just flow
Yeah, what do you say?
Let’s
See you at Pub
#seeyouatpub

Tum toh main hoon

क्यों चाहता हूँ तुमको
तुम तो मैं हूँ

पाने की ख्वाहिश नहीं
तुम तो मैं हूँ

खोने का ख़ौफ़ नहीं
तुम तो मैं हूँ

क्या सुनना है
बस शोर है
शोर इतना गूंजा
की खामोशी हो गयी

तुमसे मुलाक़ात जो हुई
खुद से पहचान हो गयी

Amma ka phone aaya

Meri Amma

अम्मा का फ़ोन आया
हाल चाल पूछा
मौसम का हाल भी समझा
फिर कुछ और कहना चाहा
तो हमने कहा
आज थोड़ा व्यस्त हूँ
कल काल करूँगा

अम्मा चुप हो गयी
कहते कहते रुक गयी
ऐसा हर बार सुना था
पर इस व्यस्त होने का तर्क
उनको कुछ विपरीत सा लगा
कई सवाल मन में उठे
कल और आज में फ़रक
बहुत गहरा नज़र आया

बेटा, ये कैसा समय है
हर काम तेज़ी से हो रहा है
फिर भी तुम ज़्यादा व्यस्त हो
आने जाने के साधन कई हैं
और ज़्यादा तेज और चुस्त हैं
फिर भी तुम ज़्यादा व्यस्त हूँ
बूढ़ी हो चुकी हूँ शायद
ऐसा अम्मा ने खुद को समझाया

दूर काम के लिए
चल के ही तो ज़ाया करते थे
घर से आफिस का सफ़र
घंटों में किया करते थे
फिर भी हर दिन अपनों से
घंटों तक बातें कर लिया करते थे
श्याम की चाय की चुस्कियों के साथ
कई क़िस्से फिर से सुना दिया करते थे

मुल्क मोहल्ले की खबर
नुक्कड़ की चाय की दुकान पर मिला करती थी
खबर सुनने का समय
उस फ़ीचर फ़िल्म के बाद
हफ़्ते में एक बार हुआ करता था
जितनी ज़रूरत थी उतना पाता था
आज कल पूरा दिन खबरों पे चर्चा होती है
फिर भी लगता है सच का कुछ पता नहीं

हिसाब किताब और वो गणित
उँगलियों पे किया करते थे
आज कम्प्यूटर और मोबाइल का दौर है
चुटकियों में सब काम हो जाता है
ख़त लिखने में घंटों बिताया करते थे
अपने जज़्बात उन पन्नों पे उतार देते थे
आज ईमेल का दौर हैं
शब्द और जवाब कम्प्यूटर खुद बता दिया करते हैं

काम जल्दी हो रहा है
ज़िंदगी की रफ़्तार भी तेज है
फिर क्यूँ दिन के चौबीस घंटे
पूरे नहीं लगते
ज़िंदा तो हैं
पर ज़िंदगी के पल
कुछ कम से लगते हैं
सब कुछ ज़्यादा है
फिर भी कमी से रहती है

अम्मा असमंजस में थी
सवाल जो मन में उठे थे
ज़ुबान तक भी पहुँचे थे
पर कहते कहते रुक गयी थी
फ़ोन भी चुप हो गया था
उस तरफ़ का कनेक्शन बंद हो गया था
पर उसे पूरा विश्वास था
फ़ोन की घंटी फिर बजेगी
देर तक बात होगी
कल का इंतेज़ार रहेगा
उसने कहा था आज व्यस्त हूँ
कल काल करूँगा