Dhund Hai, Dhoop hai

Meghalaya – Nongjrong

धुँध है
की धूप है
साँझ है
की रूप है
रूप है
तो ढल जाएगा
ख़्वाब है
तो फिर आएगा
मुझे मत उठाना
मुझे सोने दो
मुझे मेरे ख़्वाबों में
रहने दो
धूप में
धुँध में

Adhuri Tasveer

तस्वीर बनी
थोड़ी अधूरी
शायद कोई रंग रह गया
जो मेरे पास था ही नहीं
उन्हें ढूँढने निकला हूँ

सुबह की घास में कुछ
समंदर सा हरा
ढलती साँझ में
वो मायूस लाल रंग

वो ऊँचे आसमान में
वो गहरा नीला
वो हस्ते कमल में
मुस्कुराता हुआ पीला

वो टूटते लहर में
मैला सा सफ़ेद
और उस पिघलती बर्फ़ वाला
चमकीला सफ़ेद

हर अनोखा रंग समेट कर
वहाँ पहुँचा मैं
जहां सतरंगी इंद्रधनुष का झरना
धरती पर छलक रहा है

उन खुश रंगों में
नहा आया हूँ
समेटे रंग सारे
उसी झरने में डाल आया हूँ

कुछ ग़ुस्ताख़ बूँदें
मेरी तस्वीर पर गिरी
वो मेरी तस्वीर
अब कुछ पूरी सी लग रही है

Khwabon ka kaphila

ऐसा कौनसा ख़्वाब है
जो सच्चा ना लगा
ऐसा कौनसा मौक़ा है
जो मुमकिन ना लगा
पर सचाई और ख़्वाब में शायद
नींद खुलने का फ़रक है

नींद खुली और आँखें मलि
आँखों के मैल के साथ
सारे ख़्वाब भी धूल गए
दिन की भाग दौड़ में
वो मौक़ा भी खो गया

हक़ीक़त बनने का हुनर
हर ख़्वाब में था
मौक़े को लपक के
पकड़ने का हुनर
हर बेख़ौफ़ छलाँग में था

पर हर कमजोर मुट्टी ने
मौक़े की फिसलती रेत को
फ़िज़ूल ही गवा डाला है
हर सहमी छलांग ने
मासूम ख़्वाबों को
जन्म से पहले ही मार डाला है

आज फिर नींद खुली है
एक ख़्वाब नया संजोया है
हौसलों की खाद से
और कोशिशों के पानी से
मन की मीठी को
इस बार खूब सींचा है

दूर रोशनी
नज़र आने लगी है
आँखें उस लक्ष्य से
रूबरू होने लगी है
ख़्वाबों का क़ाफ़िला
हक़ीक़त की और चल पड़ा है

आपके ख़याल सुनना चाहूँगा 😊