Happy 75th Birthday Amma

हुए साल पचहत्तर
पर बस गिनती के
मन अभी भी बचपन से भरा
खिला खिला और सुंदर

नया सीखने को तैयार
बिना हिचक, बिना संकोच
चाहे हो जाए कभी कोई गलती
अपनी कोशिश, वो कभी नहीं रोकती

जो हो मन उदास
तो हँस देती है
जब ना मिले जवाब
तो ग़ुस्से से भरा message भी करती है

अभी भी शायद बैठी होगी
हम सब को अपने सपनों में सजाए
मन ही मन में सोच कर हंसती हुई
कभी किसी तस्वीर पर आँसू बहाय

शायद हम मशरूफ़ हो जातें है
अपनी अपनी ज़िंदगियों में
ये समझती है वो
पर फिर भी आस लगाये रहती है

हाँ हुए साल पचहतर
पर बस गिनती के
है वही छोटी बच्ची चुपचाप सी
चोटियां दो बांध के

It’s a good news

it’s a good news
I jump
up high
in the air
Up high
to touch
the sky
where god stays
they say
with pride
I touch
the clouds
mist slipping through
clenched fists
try and grab
the warm rays
but then fall back
empty handed
landing back
on the lap
of the mother
in the velvety grass
sprinkling stream
and rolling hills
and there
I find god
it’s a good news

Bhul gaya sab kuch

PC: WordPress

भूलना है
बहुत कुछ
क्या क्या भुलाओगे
ये बताओ

अगर याद करोगे
वो सब
तो फिर कैसे भुलाओगे
ये बताओ

हर लम्हा नया है
साफ़ सुथरा है
इसमें पुराने रंग क्यों भरें
ये बताओ

ख़ुशियों से भर दें
इस लमहें को
आने वाला कल इसमें बसा है
इसे सजाओ

ज़िंदा हो
तो जी लो ख़ुशी से
हर पल ज़िंदगी का
लुफ्त उठाओ

गहरी नींद में सो रहा हूँ
शायद सुबह हो गई है
नयी सुबह की धुन
मुझे सुनाओ

क्या भूलना था
वो तो भूल गया
नये सपनों को जीना है
अब मुझे जगाओ

Raat

ढलती शाम से
रोशनी चुरा के
अभी तो रात आयी है

धीरे से, दबे पाओं
अंधेरे की नरम रज़ाई ले के
अभी तो रात आयी है

थके बदन के लिए
नींद का तोहफ़ा ले के
अभी तो रात आयी है

आँखें हो रहीं है बंद
अब मिलेंगे ख़्वाबों से
अभी तो नींद आयी है

लेंगे उड़ान
इस दुनिया की बंदिशों से परे
अभी तो पंख फैलायें हैं

भूल गया हूँ
की नींद में हूँ
अभी अभी तो समझ आयी है

ख़्वाब और हक़ीक़त ने
मिल के कुछ इस तरह
अभी अभी तो महफ़िल सजाई है

सुबह दूर है
रात लंबी है
वक़्त को नींद अभी तो आयी है

मत उठाओ मुझे
अभी अभी तो सोया हूँ
ख़्वाब अभी अधूरे हैं
अभी तो रात आयी है

Pani ka tukda

टपकता होगा
आसमानों से
वो पानी का टुकड़ा
किसी की तलाश में
किसी की आस में

कभी मिलती होगी
उसे
वो नर्म घास
कभी गिरता होगा
बेदर्द ज़मीन पर
बस हार के

सच्ची हो जो चाहत
झुलसती विरह की आँच में
वो फिर से तपेगा
भाप बनके उड़ेगा
मिलेगा फिर
उन बादलों से

फिर बरसेगा वो
घनघोर
उसी आसमानों से
वो पानी का टुकड़ा
किसी की तलाश में
किसी की आस में