
हुए साल पचहत्तर
पर बस गिनती के
मन अभी भी बचपन से भरा
खिला खिला और सुंदर
नया सीखने को तैयार
बिना हिचक, बिना संकोच
चाहे हो जाए कभी कोई गलती
अपनी कोशिश, वो कभी नहीं रोकती
जो हो मन उदास
तो हँस देती है
जब ना मिले जवाब
तो ग़ुस्से से भरा message भी करती है
अभी भी शायद बैठी होगी
हम सब को अपने सपनों में सजाए
मन ही मन में सोच कर हंसती हुई
कभी किसी तस्वीर पर आँसू बहाय
शायद हम मशरूफ़ हो जातें है
अपनी अपनी ज़िंदगियों में
ये समझती है वो
पर फिर भी आस लगाये रहती है
हाँ हुए साल पचहतर
पर बस गिनती के
है वही छोटी बच्ची चुपचाप सी
चोटियां दो बांध के








