
ख्वाहिशें कुछ
कम सी हो गई हैं
खुश आजकल
कुछ ज़्यादा रहने लगा हूँ
…
कम भी अब
ज़्यादा लगने लगा है
अपनी पुरानी चादर में
रयीस सा लगने लगा हूँ
…
किसी रियासत का मालिक नहीं
सारा जग अपना सा लगता है
ढूँढता नहीं कोई ठिकाना
हर ठिकाना अब अपना सा लगने लगा है
…
अपने अंदर का सब
निकाल फेका है
अब जैसे सब कुछ
पूरा सा लगने लगा है
