
अपनी ही धुन में
थिरकते पांव मदमस्त
बेख़ौफ़ बेफ़िक्र
दरिया की मौज
किनारों के अंकुश से
कभी की वफ़ादारी
तो कभी बनी बाग़ी
दरिया की मौज
चले समंदर की ओर
अपनी सुदबुध छोड़ कर
अपनी पहचान भूल कर
दरिया की मौज
हिम की औलाद
समंदर में समायी
रह गयी तो बस
दरिया की मौज
