समय की बदलती रेत पर
ठंडी लहरों का खेल
मेरे गालों पर,
ये तुम्हारी, ग़ुस्ताख़ उँहलियाँ नहीं
तो और क्या है
नरम धूप से
पिघलती ओस
सुबह सुबह नींद से भरी
ये तुम्हारी, वो आँखें नहीं
तो और क्या है
ये महकती हवा
जो मुझे मदहोश कर दे
ये तुम्हारी, गरम साँसें नहीं
तो और क्या है
उठा दुआ में हाथ,
सजदे में झुका सर
हर ख्वाहिश की मंज़ूरी
ये तुम नहीं
तो और क्या है
बाहों में
एक ताल में गूंजती धड़कने
है सुकून यहाँ नहीं
तो और क्या है
वो पहला शरारती मौक़ा
वो अपना, बस अपन पल
ये जो ठहरा लम्हा है अभी,
वो अपना पहला लम्हा नहीं
तो और क्या है
गिने तो साल बीत गये
पर ये, अभी भी वही पल है
जो कभी बीता नहीं
ये पल, उम्र नहीं
तो और क्या है