Khwabon ka zayaka

ज़ायक़ा शायद
वैसा ही होगा
जैसा चखा था
उन महकते ख़्वाबों में

बदन की ख़ुशबू
मन की महक
जुड़ से गए हैं
इन सिसकती साँसों में

असल और ख़्वाब
में फ़रक
थोड़ा धुंधला गया है
इन उलझे ख़यालों में

भूल गया हूँ
क्या सच है क्या ख़्वाब है
मगन हूँ में बस
उन साँचे एहसासों में

एक निवाला प्यार का
शिद्दत से चखा है
असल का तो पता नहीं
शायद वो भी ख़्वाब हो

Published by Echoes of the soul

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