
वो इंतज़ार करती है
ना जाने क्यों,
वो राह तकती है
…
नहीं आयेंगे, बड़ी दूर हैं
ये जानती है
फिर भी,
मानने से इनकार करती है
…
अब नहीं रहे,
वो नासमझ
सयाने हो गए हैं
फिर भी फ़िक्र उनकी
यूँ ही रोज़ाना किया करती है
…
कहाँ है वक्त
इस भागती दुनिया में
बैठ के बातें करने की ख्वाहिश
बेफ़िज़ुल हर रोज़ इज़हार करती है
…
अभी कुछ
चलने में दिक्कत है
कुछ कम भी सुनाई देता है
दवाइयों का असर कम है
मिलने की ख़ुशी से ही
तन्दरुस्त हुआ करती है
…
कुछ माँगती नहीं
वक्त के सिवा
माँ है
बस बेपनाह
वो हमसे प्यार करती है
…
वो इंतज़ार करती है
ना जाने क्यों
वो राह तकती है

